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दमित हो गई सभी शाखाएं


दमित हो गयी सभी शिलाएँ 
उलझी लगती सभी घटाएँ ।
भागीरथी बना निकला था
सूख गयी सारी सरिताएॅ ।।

शंकर छोड चले कैलाश
तन जडवत है लगता लाश ।
नागफनी सिर उठा रही है 
उगी धरा में केवल काश ।।

लम्बी डगर सफर बौने का
कटती फसल नही बोने का ।
बहता पवन झुलसता अंकुर
पूरा खतम बचा कोने का ।।

दूर लग रहा सागर पाना
मूर्ख हो गया बना सयाना ।
उमा रमा है क्रुद्ध भवानी
हरकत मेरी थी बचकाना ।।

गिरवर छोड गये जगदीश 
छल-कपटी लगते है ईश ।
मरना तो मंजूर हमे है
 नही दिख सकता हूँ खीश ।।
डॉ दीनानाथ मिश्र


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